mankahee
रविवार, 17 अप्रैल 2011
रविवार, 13 दिसंबर 2009
gazal
मेरी परछाई मुझे साथ लिए जाती है
कोई ख़ामोशी सी आवाज़ दिए जाती है !
किसे इलज़ाम दें अपनी कमनसीबी का
मेरी रग-रग ही मेरा खून पिए जाती है !
कोई ख़ामोशी सी आवाज़ दिए जाती है !
किसे इलज़ाम दें अपनी कमनसीबी का
मेरी रग-रग ही मेरा खून पिए जाती है !
शनिवार, 14 नवंबर 2009
रविवार, 13 सितंबर 2009
swapn
स्वप्न - २
रात भर रंगीनियाँ दिखाकर भरमाकर -
लौट जाते हैं तड़पता छोड़कर
भोर के द्वारे से
वैश्या की तरह
मेरी आँखों से हसीन सपने !
swapn
"स्वप्न "
मैं देखना चाहता हूँ
चन्द ऐसे स्वप्न जो
बहें नहीं पानी बनकर
जम जाएँ गर्म बर्फ की तरह
आँखों में
ठीक वैसे -
जैसे जम जाते हैं आंसू
लौटें नहीं पलकों के द्वारे से
आकर;
किसी अभागिन की
बिन फेरे बारात की तरह !
aaj tum itni udas kyon ho ...?
" आज तुम इतनी उदास क्यों हो ..?"
आज तुम इतनी उदास क्यों हो
पहले कभी नहीं देखा
जब देखा था -
छत की मुंडेर पर कोहनी टिकाए
सूर्यास्त निहारते हुए
ऐसा लगा था मानो
सूर्य अपनी किरणों को
समा गया था तुम्हारी चंचल आँखों में
लीप गया था ताम्बई आभा से तुम्हारा मुख मंडल
और उसी छत पर देखा था
पूनम की रात को चांदनी में नहाते हुए
खिल गया था तुम्हारा बदन
ताजमहल -सा
आज फिर छत पर आओ
सूर्यास्त होने दो
चाँद खिलने दो
तारों को जगमगाने दो
मत डालो बाधा
प्रकृति -नियम में
मंदिर में बुझे दीये का
अपशकुन होता है .
बुधवार, 9 सितंबर 2009
shiksha
shiksha
"शिक्षा " रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो भी आता है लतियाता जाता है .....बहुत पहले श्री लाल शुक्ल जी ने कितनी सटीक व्याख्या की थी ....शिक्षा की जो आज भी सौ फीसदी सही है .......क्योंकि जो भी सरकार आती है वही प्रयोग करने बैठ जाती है !शायद शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा बलात अपनी विचार धारा को फैलाया जा सकता है जो काम गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने किया वही काम आज की सरकारें कर रही हैं .......!
..........अब वर्तमान मंत्री जी अपने प्रयोगों को लेकर चर्चा में हैं ! यह प्रयोग कितने सही हैं कितने गलत ....कितने सफल होते हैं कितने असफल यह तो भविष्य ही बताएगा ..
.......लेकिन मुझे जो कहना है वह यह कि मंत्री अफसर जो भी नीति नियम बनाते हैं वह शहरों और उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं बावजूद इसके कि भारत गाँव और गरीबों का देश है ! गाँधी बाबा ने भी कहा था कि भारत में कोई भी योजना बनाते समय सबसे आख़री व्यक्ति से शुरू करना चाहिए तभी वह सफल हो सकती है !और क्या यही कारण नहीं है कि इंडिया और भारत के बीच खाई दिन ब दिन बदती जा रही है .......! और फिर ग्रेडिंग सिस्टम से कोण सा क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है सिर्फ नाम बदलने से परिवर्तन नहीं हुआ करते ....प्रतिशत की जगह ग्रेडिंग के लिए मारामारी नहीं होगी ...?
"शिक्षा " रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो भी आता है लतियाता जाता है .....बहुत पहले श्री लाल शुक्ल जी ने कितनी सटीक व्याख्या की थी ....शिक्षा की जो आज भी सौ फीसदी सही है .......क्योंकि जो भी सरकार आती है वही प्रयोग करने बैठ जाती है !शायद शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा बलात अपनी विचार धारा को फैलाया जा सकता है जो काम गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने किया वही काम आज की सरकारें कर रही हैं .......!
..........अब वर्तमान मंत्री जी अपने प्रयोगों को लेकर चर्चा में हैं ! यह प्रयोग कितने सही हैं कितने गलत ....कितने सफल होते हैं कितने असफल यह तो भविष्य ही बताएगा ..
.......लेकिन मुझे जो कहना है वह यह कि मंत्री अफसर जो भी नीति नियम बनाते हैं वह शहरों और उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं बावजूद इसके कि भारत गाँव और गरीबों का देश है ! गाँधी बाबा ने भी कहा था कि भारत में कोई भी योजना बनाते समय सबसे आख़री व्यक्ति से शुरू करना चाहिए तभी वह सफल हो सकती है !और क्या यही कारण नहीं है कि इंडिया और भारत के बीच खाई दिन ब दिन बदती जा रही है .......! और फिर ग्रेडिंग सिस्टम से कोण सा क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है सिर्फ नाम बदलने से परिवर्तन नहीं हुआ करते ....प्रतिशत की जगह ग्रेडिंग के लिए मारामारी नहीं होगी ...?
sarkaar our janta
लोकतंत्र में लोक बड़ा है या तंत्र ....? निस्संदेह आप लोक ही कहेंगे क्योंकि किताबों में हमें यही पढाया गया है और हमने बिना किसी तर्क, बहस ,बिना सोचे -विचारे स्वीकार भी कर लिया है ! लेकिन हकीकत क्या है ...?हकीकत इससे कोसों दूर है ....दरअसल सच्चाई यह है कि सिर्फ चुनाव के वर्ष लोक बड़ा होता है बाकी चार वर्ष तंत्र हावी रहता है लोक पर ......! इसका ताजा सबूत भोपाल में शिक्षकों पर पुलिस द्वारा बरसाई गई लाठीयां हैं !एक ही सप्ताह में दो बार बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज क्या आपको तानाशाही या सामंतवाद की याद नहीं कराता ! चुनाव के समय सभी दल,पार्टियाँ ,नेता बड़े -बड़े दावे करते हैं ,जनता के हित की दुहाई देते नहीं थकते लेकिन चुनाव होते ही सारे वादे हवा हो जाते हैं !चुनाव के समय यह हमारे ऊपर लालच का जाल फेंकते हैं और हम उसमें फंस जाते हैं ! तभी तो चुनाव के समय पेट्रोल के दाम घटा दिए और चुनाव होते ही बढा दिए ! इसी तरह मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह ने अध्यापकों के हित के बड़े बड़े वादे किये थे लेकिन आज उन पर लाठियां भांज रहे हैं !लेकिन सत्ता के मद में यह भूल गए हैं कि इन्ही अध्यापकों के कारण वो सत्ता में आये हैं और इन्ही अध्यापकों ने दो बार सत्ता परिवर्तित की है !
......लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इस सबके लिए जिम्मेवार कौन है ....? बेशक हम स्वयं ....प्राचीन काल में एक कहावत थी ...यथा राजा तथा प्रजा ...लेकिन आज है "यथा प्रजा तथा राजा " शायद हम इसी के काबिल हैं ..!
शनिवार, 5 सितंबर 2009
शिक्षक दिवस
बिना किसी शोर शराबे के शिक्षक दिवस गुज़र गया । पश्चिम के समस्त दिवस यथा -फादर्स, मदर्स और विशेषतया वैलेंटाइन डे होता तो क्या हाल होता कहने की आवश्यकता नहीं । सारे अख़बार ,चैनल्स उसके गुन गा रहे होते । लेकिन जहाँ सरकार,समाज,मिडिया में शिक्षा हाशिये पर हो वहां और उम्मीद भी क्या की जा सकती है । जिस समाज में शिक्षक को वेतन बढाने के लिए हड़ताल करना पड़ रही हो उस समाज का भगवान् ही मालिक है। बाजारवाद का दौर है और शिक्षा बिकाऊ माल नहीं है ।
यह बात अलग है की आज शिक्षा व्यवसाय बनती जा रही है लेकिन उसमें भी गाँव और गरीब कहाँ हैं.क्या यह दूरी और यह भेद समाज में आतंकवाद ,नक्सलवाद की ज़मीन तैयार नहीं करेगा ।
आज शिक्षक दिवस के मौके पर क्या हम सबको मिलकर सोचने -विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि आख़िर हम कैसे समाज का निर्माण करना चाहते है। क्योंकि समाज निर्माण कि प्रष्ठभूमि शिक्षा ही तय करती है ।
अगर इन सरोकारों से आपकी चिंता मेल खाती हो तो इस विचार को अवश्य आगे बढाएं ।
यह बात अलग है की आज शिक्षा व्यवसाय बनती जा रही है लेकिन उसमें भी गाँव और गरीब कहाँ हैं.क्या यह दूरी और यह भेद समाज में आतंकवाद ,नक्सलवाद की ज़मीन तैयार नहीं करेगा ।
आज शिक्षक दिवस के मौके पर क्या हम सबको मिलकर सोचने -विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि आख़िर हम कैसे समाज का निर्माण करना चाहते है। क्योंकि समाज निर्माण कि प्रष्ठभूमि शिक्षा ही तय करती है ।
अगर इन सरोकारों से आपकी चिंता मेल खाती हो तो इस विचार को अवश्य आगे बढाएं ।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)