लोकतंत्र में लोक बड़ा है या तंत्र ....? निस्संदेह आप लोक ही कहेंगे क्योंकि किताबों में हमें यही पढाया गया है और हमने बिना किसी तर्क, बहस ,बिना सोचे -विचारे स्वीकार भी कर लिया है ! लेकिन हकीकत क्या है ...?हकीकत इससे कोसों दूर है ....दरअसल सच्चाई यह है कि सिर्फ चुनाव के वर्ष लोक बड़ा होता है बाकी चार वर्ष तंत्र हावी रहता है लोक पर ......! इसका ताजा सबूत भोपाल में शिक्षकों पर पुलिस द्वारा बरसाई गई लाठीयां हैं !एक ही सप्ताह में दो बार बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज क्या आपको तानाशाही या सामंतवाद की याद नहीं कराता ! चुनाव के समय सभी दल,पार्टियाँ ,नेता बड़े -बड़े दावे करते हैं ,जनता के हित की दुहाई देते नहीं थकते लेकिन चुनाव होते ही सारे वादे हवा हो जाते हैं !चुनाव के समय यह हमारे ऊपर लालच का जाल फेंकते हैं और हम उसमें फंस जाते हैं ! तभी तो चुनाव के समय पेट्रोल के दाम घटा दिए और चुनाव होते ही बढा दिए ! इसी तरह मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह ने अध्यापकों के हित के बड़े बड़े वादे किये थे लेकिन आज उन पर लाठियां भांज रहे हैं !लेकिन सत्ता के मद में यह भूल गए हैं कि इन्ही अध्यापकों के कारण वो सत्ता में आये हैं और इन्ही अध्यापकों ने दो बार सत्ता परिवर्तित की है !
......लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इस सबके लिए जिम्मेवार कौन है ....? बेशक हम स्वयं ....प्राचीन काल में एक कहावत थी ...यथा राजा तथा प्रजा ...लेकिन आज है "यथा प्रजा तथा राजा " शायद हम इसी के काबिल हैं ..!
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