आज तुम इतनी उदास क्यों हो
पहले कभी नहीं देखा
जब देखा था -
छत की मुंडेर पर कोहनी टिकाए
सूर्यास्त निहारते हुए
ऐसा लगा था मानो
सूर्य अपनी किरणों को
समा गया था तुम्हारी चंचल आँखों में
लीप गया था ताम्बई आभा से तुम्हारा मुख मंडल
और उसी छत पर देखा था
पूनम की रात को चांदनी में नहाते हुए
खिल गया था तुम्हारा बदन
ताजमहल -सा
आज फिर छत पर आओ
सूर्यास्त होने दो
चाँद खिलने दो
तारों को जगमगाने दो
मत डालो बाधा
प्रकृति -नियम में
मंदिर में बुझे दीये का
अपशकुन होता है .
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