रविवार, 13 सितंबर 2009

swapn

स्वप्न - २
रात भर रंगीनियाँ दिखाकर भरमाकर -
लौट जाते हैं तड़पता छोड़कर 
भोर के द्वारे से 
वैश्या की तरह 
मेरी आँखों से हसीन सपने !

swapn

"स्वप्न "
मैं देखना चाहता हूँ 
चन्द ऐसे स्वप्न जो 
बहें नहीं पानी बनकर 
जम जाएँ गर्म बर्फ की तरह 
आँखों में 
ठीक वैसे -
जैसे जम जाते हैं आंसू 
लौटें नहीं पलकों के द्वारे से 
आकर;
किसी अभागिन की 
बिन फेरे बारात की तरह !

aaj tum itni udas kyon ho ...?

" आज तुम इतनी उदास क्यों हो ..?"
आज तुम इतनी उदास क्यों हो 
पहले कभी नहीं देखा 
जब देखा था -
छत की मुंडेर पर कोहनी टिकाए
सूर्यास्त निहारते हुए 
ऐसा लगा था मानो 
सूर्य अपनी किरणों को 
समा गया था तुम्हारी चंचल आँखों में 
लीप गया था ताम्बई आभा से तुम्हारा मुख मंडल 
और उसी छत पर देखा था 
पूनम की रात को चांदनी में नहाते हुए 
खिल गया था तुम्हारा बदन 
ताजमहल -सा 
आज फिर छत पर आओ 
सूर्यास्त होने दो 
चाँद खिलने दो 
तारों को जगमगाने दो 
मत डालो बाधा 
प्रकृति -नियम में 
मंदिर में बुझे दीये का 
अपशकुन होता है .