shiksha
"शिक्षा " रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो भी आता है लतियाता जाता है .....बहुत पहले श्री लाल शुक्ल जी ने कितनी सटीक व्याख्या की थी ....शिक्षा की जो आज भी सौ फीसदी सही है .......क्योंकि जो भी सरकार आती है वही प्रयोग करने बैठ जाती है !शायद शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा बलात अपनी विचार धारा को फैलाया जा सकता है जो काम गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने किया वही काम आज की सरकारें कर रही हैं .......!
..........अब वर्तमान मंत्री जी अपने प्रयोगों को लेकर चर्चा में हैं ! यह प्रयोग कितने सही हैं कितने गलत ....कितने सफल होते हैं कितने असफल यह तो भविष्य ही बताएगा ..
.......लेकिन मुझे जो कहना है वह यह कि मंत्री अफसर जो भी नीति नियम बनाते हैं वह शहरों और उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं बावजूद इसके कि भारत गाँव और गरीबों का देश है ! गाँधी बाबा ने भी कहा था कि भारत में कोई भी योजना बनाते समय सबसे आख़री व्यक्ति से शुरू करना चाहिए तभी वह सफल हो सकती है !और क्या यही कारण नहीं है कि इंडिया और भारत के बीच खाई दिन ब दिन बदती जा रही है .......! और फिर ग्रेडिंग सिस्टम से कोण सा क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है सिर्फ नाम बदलने से परिवर्तन नहीं हुआ करते ....प्रतिशत की जगह ग्रेडिंग के लिए मारामारी नहीं होगी ...?
बुधवार, 9 सितंबर 2009
sarkaar our janta
लोकतंत्र में लोक बड़ा है या तंत्र ....? निस्संदेह आप लोक ही कहेंगे क्योंकि किताबों में हमें यही पढाया गया है और हमने बिना किसी तर्क, बहस ,बिना सोचे -विचारे स्वीकार भी कर लिया है ! लेकिन हकीकत क्या है ...?हकीकत इससे कोसों दूर है ....दरअसल सच्चाई यह है कि सिर्फ चुनाव के वर्ष लोक बड़ा होता है बाकी चार वर्ष तंत्र हावी रहता है लोक पर ......! इसका ताजा सबूत भोपाल में शिक्षकों पर पुलिस द्वारा बरसाई गई लाठीयां हैं !एक ही सप्ताह में दो बार बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज क्या आपको तानाशाही या सामंतवाद की याद नहीं कराता ! चुनाव के समय सभी दल,पार्टियाँ ,नेता बड़े -बड़े दावे करते हैं ,जनता के हित की दुहाई देते नहीं थकते लेकिन चुनाव होते ही सारे वादे हवा हो जाते हैं !चुनाव के समय यह हमारे ऊपर लालच का जाल फेंकते हैं और हम उसमें फंस जाते हैं ! तभी तो चुनाव के समय पेट्रोल के दाम घटा दिए और चुनाव होते ही बढा दिए ! इसी तरह मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह ने अध्यापकों के हित के बड़े बड़े वादे किये थे लेकिन आज उन पर लाठियां भांज रहे हैं !लेकिन सत्ता के मद में यह भूल गए हैं कि इन्ही अध्यापकों के कारण वो सत्ता में आये हैं और इन्ही अध्यापकों ने दो बार सत्ता परिवर्तित की है !
......लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इस सबके लिए जिम्मेवार कौन है ....? बेशक हम स्वयं ....प्राचीन काल में एक कहावत थी ...यथा राजा तथा प्रजा ...लेकिन आज है "यथा प्रजा तथा राजा " शायद हम इसी के काबिल हैं ..!
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