शनिवार, 5 सितंबर 2009

शिक्षक दिवस

बिना किसी शोर शराबे के शिक्षक दिवस गुज़र गया । पश्चिम के समस्त दिवस यथा -फादर्स, मदर्स और विशेषतया वैलेंटाइन डे होता तो क्या हाल होता कहने की आवश्यकता नहीं । सारे अख़बार ,चैनल्स उसके गुन गा रहे होते । लेकिन जहाँ सरकार,समाज,मिडिया में शिक्षा हाशिये पर हो वहां और उम्मीद भी क्या की जा सकती है । जिस समाज में शिक्षक को वेतन बढाने के लिए हड़ताल करना पड़ रही हो उस समाज का भगवान् ही मालिक है। बाजारवाद का दौर है और शिक्षा बिकाऊ माल नहीं है ।
यह बात अलग है की आज शिक्षा व्यवसाय बनती जा रही है लेकिन उसमें भी गाँव और गरीब कहाँ हैं.क्या यह दूरी और यह भेद समाज में आतंकवाद ,नक्सलवाद की ज़मीन तैयार नहीं करेगा ।
आज शिक्षक दिवस के मौके पर क्या हम सबको मिलकर सोचने -विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि आख़िर हम कैसे समाज का निर्माण करना चाहते है। क्योंकि समाज निर्माण कि प्रष्ठभूमि शिक्षा ही तय करती है ।
अगर इन सरोकारों से आपकी चिंता मेल खाती हो तो इस विचार को अवश्य आगे बढाएं ।

4 टिप्‍पणियां:

bhootnath ने कहा…

baat to sahi hi hai.....!!

बेनामी ने कहा…

It is a fact , welcome sir

Unknown ने कहा…

Bahut Barhia...aapka swagat hai... isi tarah likhte rahiye...

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जयंत श्रीवास्तव ने कहा…

is duniya(blog ki) men naya hun. niyam kayde tour tarike nahi janta .seekh raha hun .ummid hai aap logo ka sahyog milega. protsahan ke liye dhanyawad.